मेरी बात : कहीं गोचर भूमि भी सत्ताधीशों के लिये ‘फोकट प्रश्न’ तो नहीं ?

-सुमित शर्मा

लगातार 7 बरसों से भारत का सबसे ‘साफ’ शहर इंदौर असल में कितना ‘गंदा’ है, ये पूरे देश ने देखा। जहां दूषित पानी पीने से क़रीब 3000 लोग (लेख लिखे जाने तक) बीमार हो चुके हैं, 32 लोग ICU में भर्ती हैं और 15 लोग मर चुके हैं। तिस पर सवाल पूछने पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पत्रकार पर भड़क जाते हैं, डांटते हुये कहते हैं- “अरे ! छोड़ो यार, तुम फोकट प्रश्न मत पूछो।”

उफ्फ ! इतनी घोर लापरवाही और इसका यह जवाब ? पत्रकार कहता है- “सा’ब ! फोकट नहीं। मैं वहां होकर आया हूं।”
विजयवर्गीय- “घंटा होकर आये हो तुम?”

ऐसा कहते हुये, आंखें दिखाते हुये मंत्री अपने लवाजमे के साथ आगे बढ़ जाते हैं और पीछे छूट जाते हैं- कई अनसुलझे सवाल।

सवाल यह कि- आपकी लापरवाही के चलते 15 लोग मर चुके हैं। किसी परिवार ने बच्चा खोया तो किसी ने बुजुर्ग। ..और आप कहते हैं कि “फोकट प्रश्न मत पूछो।”
सवाल यह कि- जिस घटना के लिये सत्तारूढ़ नेताओं को शर्मिंदा होना चाहिये था, वे पत्रकार को धमकाने के से लहजे में कहते हैं “घंटा होकर आये हो तुम?”

कुछ ऐसा ही होता है, जब सत्ता.. ‘सेवा’ की बजाय ‘सुरूर’ बनने लगती है। तब नेताओं/मंतरियों की ‘मीठी’ जुबान ‘कड़वी’ होने लगती है। उनका दंभ हिमालय के शिखर को छूने लगता है और जनता की तकलीफें बौनी, ‘फोकट’ और ‘घंटा’ लगने लगती हैं। सुहाती हैं तो फकत ठकुरसुहातियां। सच्ची-कड़वी बातों से चिढ़ मचने लगती है। तब कोई पत्रकार सत्तासीनों से जनता के हिस्से का ज़रुरी सवाल पूछ ले तो उनके नथूने फूलने लगते हैं। चिढ़ा हुआ सा जवाब निकलता है- “घंटा होकर आये हो तुम?”

यह जवाब है- ऊंचे पद पर बैठे भाजपा के किसी मंत्री का। यह तो हुई इंदौर की बात, इसी तरह राजस्थान के बीकानेर में भी ऐसे कई सवाल अर्से से जवाब के इंतजार में हैं। फिलवक़्त सबसे बड़ा सवाल है- बीकानेर में चल रहा गोचर आंदोलन। मस’ला यह कि बरसों पहले यहां के दानदाताओं ने गायों के चरने के लिये हज़ारों बीघा जमीन ख़रीदकर दान कर दी थी। बीकानेर की परिधि के बाहर पसरी इस 45 हज़ार बीघा गोचर भूमि पर दशकों से गायें चरती रही हैं। लेकिन 1 सितंबर 2025 को राजस्थान सरकार के एक नोटिफिकेशन ने इस सिलसिले को थामने की कोशिश का काम किया। इसमें गोचर भूमि के आवंटन के आदेश थे। इसके बाद बीकानेर विकास प्राधिकरण 188 गांवों की गोचर भूमि पर अधिग्रहण का प्रस्ताव जारी करता है। वायदा यह कि इस जमीन पर इमारतें बनेंगी, व्यापार होंगे, शहर का विकास होगा, वगैरह..वगैरह।

बीडीए के इस प्रस्ताव का विरोध होना तय था। जमकर विरोध हुआ। हज़ारों गौ प्रेमी, गोचर संरक्षक, साधु-संत और नागरिक कलेक्ट्रेट के सामने इकट्ठा हुए। विरोध के अलग-अलग तरीकों से शासन-प्रशासन को चेताया गया। इतना ही नहीं, 40 हज़ार आपत्ति पत्र सरकार और प्रशासन को सौंपे गये। ..लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी शासन-प्रशासन के कानों पर जूं तक न रेंगी। न कोई विधायक बोले और न ही सांसद के बोल फूटे। बोलते भी कैसे? सत्तारूढ़ पार्टी (बीजेपी) उन्हीं की जो है। केंद्र में भी और राज्य में भी। यानी- डबल इंजन की सरकार।

गोचर-ओरण बचाओ महा आंदोलन से जुड़े मन्नू सेवग, शिव गहलोत, कैलाश सोलंकी जैसे हज़ारों गोचर संरक्षक जानना चाह रहे हैं कि-
“भाजपा तो गाय के नाम पर वोट मांगती आई है, फिर उसी भाजपा सरकार में गोचर पर अधिग्रहण का प्रस्ताव क्यों?” इस सवाल पर किसी की चुप्पियां नहीं टूट रहीं। गोया जवाब यही हों कि “ऐसे फोकट प्रश्न मत पूछो।”

महेंद्र किराड़ू, सूरज प्रकाश राव समेत हज़ारों गौ प्रेमी पूछना चाहते हैं कि- “बीकानेर के विकास के लिये गोचर भूमि का अधिग्रहण ही एकमात्र रास्ता बचा है क्या?” लेकिन शासन से लेकर प्रशासन तक… किसी के पास समय नहीं कि जवाब दें। गोया जवाब यही हों कि “ऐसे फोकट प्रश्न मत पूछो।”

सूरजमल सिंह नीमराणा, विजय कोचर समेत हज़ारों नागरिक प्रशासन से पूछना चाहते हैं कि “हम गोचर भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव के विरोध में 40 हज़ार आपत्ति पत्र दे चुके हैं। लेकिन एक भी जवाब नहीं मिला, क्यों?” शायद शासन-प्रशासन की चुप्पी यही कह रही हो कि “ऐसे फोकट प्रश्न मत पूछो।”

सवाल पर सवाल पूछे जाते रहे, लेकिन जवाब एक का भी नहीं मिला। जब इंतजार की इंतहा हो गई तो आंदोलनकारियों ने ही आगे होकर माना कि संभवत: उनकी आवाज़ उतनी बुलंद नहीं रही होगी, जितनी हाल ही में अरावली मसले को लेकर हुई थी। तभी तो किसी की चुप्पी तक न टूटी। ऐसे में तय हुआ कि बीकानेर में इतना बड़ा आंदोलन किया जाए, जिसकी गूंज दिल्ली तक पहुंचे। महामंडलेश्वर सरजूदास महाराज ने बताया कि “27 जनवरी 2026 से देशभर के साधु-संत आकर जिला कलेक्ट्रेट के सामने इस आंदोलन को बुलंद करेंगे। सरकार को चेताया जाएगा।”

वैसे, यह दीगर है कि-
जिस शहर के बाशिंदे साढ़े 3 दशकों से रोज़ क़रीब 8-10 घंटे बंद होने वाले रेलवे फाटक की समस्या से जूझते हों। (यहां क्लिक कर पढ़ें)
– जिस शहर के बाशिंदे नाले के पानी की निकासी की छोटी सी समस्या के लिये सत्ता के बड़े शीर्षस्थों से जूझते हों।
(यहां क्लिक कर पढ़ें)
– जिस शहर में एक समय में 4-4 मंत्री रहे हों, फिर भी उस शहर के सबसे बड़े व्यापारी को किसी बाहरी परिचित को बीकानेर में आमंत्रित करने में शर्म महसूस होती हो।
(यहां क्लिक कर पढ़ें)
– जिस शहर में बुनियादी जरुरतें- मसलन सड़कें, नालियां वगैरह के लिये भी नेताओं से बारंबार गुहार लगानी पड़ती हो।
(यहां क्लिक कर पढ़ें) उस सबसे बड़े गांव के नाम से विख्यात हो चुके बीकानेर के नेताओं/मंतरी से क्या ही उम्मीद लगाई जा सकती है? एकबारगी तो लगा कि गोचर संरक्षकों, गौप्रेमियों के लंबे संघर्ष के सवाल पर कहीं वे भी पत्रकारों को धमकाते हुए (पहले भी) यह न कह डालें कि “अरे ! छोड़ो यार, तुम ‘फोकट’ का प्रश्न मत पूछो.. ‘घंटा’ होकर आये हो तुम?”

फिर लगा हमारे ‘मृदुभाषी’ नेता अब संभवत: ऐसा न बोलें। लेकिन.. गौप्रेमियों, गोचर रक्षकों को यह विश्वास कोई कैसे दिलाये? इसके लिये तो ख़ुद नेताओं को ही आगे आना होगा। अब यक्ष प्रश्न यही है कि जो पहले भी न आए, क्या अब आ जाएंगे ? या आंदोलन के बाद उनको आना पड़ेगा?

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8 thoughts on “मेरी बात : कहीं गोचर भूमि भी सत्ताधीशों के लिये ‘फोकट प्रश्न’ तो नहीं ?

  1. राजनीति जब संवेदनाओं पर हावी हो जाए, सारे प्रश्न फोकट के ही लगते हैं। जरुरी बात पर लिखने के लिए खूब शुभकामनाएं

    1. आपका प्रोत्साहन ही हमारी ताक़त बनता है।
      शुक्रिया आपका।

  2. बहुत ही सटीक विश्लेषण और प्रभावी प्रस्तुति। जमीन से जुड़ी पत्रकारिता और प्रभावी लेखनी का परिणाम अवश्य ही मिलता है। आमजन का समर्थन भी। बहुत शुभकामनाएं और बधाई भाई सुमित जी
    सादर हरिओम शर्मा

    1. आपका धन्यवाद।
      आप सबके प्रोत्साहन से ही ताक़त मिलती है।

  3. शानदार।👍
    नेताओ को पाटीॅ,खुद-पीढी,के लिए आज व आगे भी मोटा चंदा देने मे बाधक प्रश्न फोकट वाले है।सनातन ने भविष्य मे प्राणी जीवन खतरे के पूर्वाभास समझ से गौमाता पहाड पेड़ को त्योहार पर (गोबर वृक्ष गोवर्धन) समय अंतराल से पूजन से जोड़ा।ये सब भविष्य मे चित्र व जू मे दिखेंगे।

  4. सबसे पहले इस शानदार, निष्पक्ष, निडर आलेख और पत्रकारिता के लिए हार्दिक बधाई।
    अभी ज्यादातर पत्रकारिता परोक्ष अपरोक्ष रूप में किसी पक्ष-विपक्ष की तरफ़ झुकी हुई दीखती है तब भाई सुमित जी आपने एक ज्वलंत विषय पर सरकार के दोहरे मापदंड पर उचित संज्ञान लिया है।इसी समझ और साहसिकता के लिए पत्रकारिता जानी जाती है ।
    आप जैसे युवा और प्रतिभाशाली पत्रकारों के कारण पत्रकारिकता की साख बनी हुई है।आप भावी युवा पत्रकारों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है।
    बधाई हो बधाई
    ✨✨✨✨👏🏻👏🏻👏🏻✨✨✨

    1. प्रोत्साहन के लिए बहुत शुक्रिया भाई विनोद जी जोशी।

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