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विमर्श : ऊंटों के वजूद पर संकट गहराता जा रहा है

आज 30 मार्च को हम लोग ‘राजस्थान दिवस’ मना रहे हैं। राजस्थान की एक स्थाई पहचान ‘ऊंट’ के तौर पर भी रही है। आंखें बंद करके आप भी अगर राजस्थान की कल्पना करेंगे तो सबसे पहले ‘ऊंट’ की तसवीर ही दिखाई देगी। यही वजह है कि ऊंट को राजस्थान के ‘राज्य पशु’ का दर्जा प्राप्त है। बहरहाल, आज के ‘विमर्श’ में ऊंटों की ‘गौरव गाथा’ नहीं बल्कि उनकी ‘व्यथा-कथा’ की चर्चा होगी। क्योंकि जिस ऊंट को राजस्थान की ‘आन-बान-शान’ कहा जाता है, आज उसके ‘वजूद’ पर ही संकट के बादल मंडराते देखे जा सकते हैं। अगर यही हालात रहे तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ तसवीरों में ऊंटों को देख सकेगी। इसलिये आज सबका ‘चेतना’ ज़रुरी है।

लड़ली लूमा झूमा रे..
लड़ली लूमा झूमा रे..
ओ म्हारो गोरबंद नखरालो..

यह गीत सुनने में जितना मीठा लगता है, उससे भी मीठा तब लगता है जब गले में ‘गोरबंद’ पहने किसी रंग-रंगीले सजे-संवरे ऊंट को देखते हैं। बीकानेर में ‘ऊंट-उत्सव’ के दौरान तो ऊंट ऐसे सजाए जाते हैं मानो किसी दुल्हन को सजाया जा रहा हो। दुल्हनें 16 श्रृंगार करती हैं मगर इन ऊंटों को 20 से भी ज्यादा श्रृंगार किये जाते हैं। ये दिखाने-जताने के लिये कि ऊंट-सा सुंदर कोई नहीं, ऊंट-सी परवाह किसी की नहीं। लेकिन असल में ये सब ‘ऊंट-उत्सव’ के 2-3 दिनों तक ही। आप जानकर हैरान होंगे कि बीते दशकों में ऊंटों की संख्या तेज़ी से कम हुई है।

तथ्यों की बात करें तो साल 1983 में ऊंटों की संख्या 7 लाख 56 हजार थी, जो 2019 की पशु गणना में घटकर 2 लाख 13 हजार रह गई। गिरावट के इस ग्राफ से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अब ऊंटों की संख्या कितनी रह गई होगी और अगले दशक में कितने ऊंट बच पाएंगे। विश्लेषण करेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि अगर यही हालात रहे तो आने वाले दशक में ऊंट की संख्या सैकड़ों में ही सिमट जाएगी। सवाल उठता है कि राजस्थान के गीतों में गाए जाने वाले ‘राज्य पशु’ का ‘राज्य वृक्ष’ सरीखा हस्र क्यों हो रहा है? तो जवाब है- ऊंटों की उपयोगिता में कमी और सरकार की लचर नीति। आज ऊंटों के श्रम की जगह मशीनों ने ले ली है। तकनीक ने चीज़ों को आसान बना दिया है। ये अच्छी बात है। मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि तकनीक से तुलना में कमतर होने के चलते ‘राज्य पशु’ के वर्चस्व को ही ख़तरे में डाल दिया जाए? आज आलम यह है कि ऊंट को फकत गोश्त का जरिया मान लिया गया है। बांग्लादेश और अन्य स्थानों पर ऊंटों की कितनी तस्करी होती है, सरकारों को इसे जानने और समझने की ज़रुरत है। साल 2015 में सरकार ने ऊंट को राज्य पशु का दर्जा देकर कानून बनाकर उन्हें राज्य से बाहर ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन इस कानून की कितनी पालना हो रही है, ये भी समझने की ज़रुरत है। हकीकत तो यह है कि ऊंटो की तस्करी रोकने की प्रभावी नीति नहीं होने से ऊंट बूचड़खाने पहुंच रहे हैं।

अभी पिछले दिनों बीकानेर की छतरगढ़ तहसील में तस्करी ले जाए जा रहे 16 ऊंटों को गौ रक्षा दल ने मुक्त करवाया। इससे पहले भी चुरू में 14 ऊंटों से भरा ट्रक पकड़ा गया था। यह ट्रक हनुमानगढ़ से उत्तर प्रदेश जा रहा था। बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चुरू से होकर ऊंटों की तस्करी होती है। ये ऊंट अलवर होते हुए ट्रकों व कंटेनरों में बंद करके अररिया, पूर्णियां, किशनगंज के रास्ते कुर्बानी के लिए बांग्लादेश जाते हैं। बिहार से भी ऊंटों की तस्करी के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ था।

पश्चिमी राजस्थान में जैसलमेर में 50 हजार ऊंट बचे हैं। अन्य जिलों में भी ऊंटों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। राजस्थान सरकार द्वारा ऊंटो की तस्करी रोकने की प्रभावी नीति नहीं होने से ऊंटों को बूचड़खाने में जाने से रोक नहीं पा रही है। पशु क्रूरता अधिनियम और राजस्थान ऊष्ट्र अधिनियम ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाए हैं। राजस्थान सरकार ने ऊंटों के संर्वधन और संरक्षण के लिए बनाई ऊष्ट्र विकास योजना में ऊंट पालकों को तीन किश्तों में 10 हजार रुपए देने की योजना बंद कर दी गई है। ऊंटों को पर्यटन और दूध से प्रोडक्ट बनाने का काम भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है। ‘रेगिस्तान का जहाज़’ डूबने के कगार पर है।

अखिल भारतीय कृषि गो सेवा संघ के ट्रस्टी व एनीमल वेलफेयर कमेटी के सदस्य कमलेश शाह का कहना है कि “हमारे कार्यकर्ता तैलगाना, हैदराबाद, यूपी, बिहार और पश्चिमी बंगाल में बांग्लादेश बूचड़ खाने में तस्करी से ले जाते ऊंटो को छुड़ाते हैं। ये ऊंट ज्यादातर राजस्थान से आते हैं। राजस्थान सरकार को ऊंटों की तस्करी रोकने के कड़े प्रयास करने की ज़रुरत है, नहीं तो ऊंटों के वजूद को बचाना मुश्किल हो जाएगा। राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या पर कोई बोलने वाला नहीं है। सरकार ने भी चुप्पी साध रखी है। ऊंट पालक परम्परागत ‘राइका’ जाति के लोग भी ऊंटपालन छोड़ रहे हैं। ऐसे में ऊटों के अस्तित्व पर संकट छाया हुआ है। ऐसे में जिस तरह आज की पीढ़ी ‘गोरबंद’ का मतलब नहीं जानती, आने वाली पीढ़ी ऊंटों को नहीं जानेगी। इसके लिये हम सब जिम्मेदार होंगे।

राजस्थान दिवस की अनेक शुभकामनाओं के साथ..

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