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विमर्श- केन्द्र और राज्य सरकारों की लाइसेंस ऑथिरिटी कितनी जिम्मेदार ?

बीकानेर खाद्य प्रसंस्करण का हब है। यहां घी, दूध और मावे में मिलावट और अमानक खाद्य सामग्री के नमूने स्वास्थ्य विभाग और खाद्य निरीक्षण लेते रहते हैं। त्योहारों के मौके पर खास तौर पर ख़राब और मिलावटी खाद्य सामग्री नष्ट भी की जाती है। यही हाल प्रदेश के अन्य ज़िलों के हैं। जरुरत इस बात की है कि केन्द्र और राज्य सरकार की लाइसेंस ऑथिरिटी को नक़ली दवाएं और अमानक खाद्य सामग्री पर नियंत्रण के लिए कठोर रुख अख्तियार करना चाहिए। नकली दवाएं और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को सरकार की नीति में लाएं। मनमानी की छूट क्यों दी जा रही है ? सरकार की कारगर नीति नहीं होना ही सबसे बड़ा कारण है। देश में उपभोक्त कानून में नकली दवाएं, कम गुणवत्ता की दवाएँ, मिलावट दूध, घी, मानक की अनदेखी कर बनाई गई खाद्य सामग्री, घटिया और मिलावटी भोज्य सामग्री पर प्रभावी रोक-टोक नहीं है। बेशक, इससे जन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसकी जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकार की लाइसेंस ऑथिरिटी की है। यानि राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ नकली और घटियां दवाएं और अमानक खाद्य सामग्री खिलाकर केन्द्र और राज्य सरकार की लाइसेंस ऑथिरिटी जन स्वास्थ्य के साथ खिलावाड़ कर रही है। भ्रामक विज्ञापनों पर रोक के लिए भी नियामकों की पालना क्यों नहीं हो रही है ? केन्द्र और राज्य सरकार की लाईसेंस ऑथिरिटी का अमानक दवाओं और खाद्य सामग्री पर प्रभावी नियंत्रण ही नहीं है। ऐसे उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनो के माया जाल में उपभोक्ता फंसा हुआ है।

आप जहां तहां नकली और घटिया दवाएं, मिलावटी खाद्य सामग्री, अमानक भोज्य पदार्थ मिलेंगे। खरीदना उपभोक्ता की मजबूरी होगी, क्योंकि नकली और घटियां होने के मानक तय करने की बाजार में कोई सुविधा नहीं है। केन्द्र और राज्य सरकार की लाईसेंस ऑथिरिटी का इन विक्रेताओं पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। मिलावटी और घटियां खाद्य सामग्री नकली और घटिया दवाऐं, मिलावटी दूध घी आम बात है। इसे रोकने के लिए सरकार की सक्रियता पहली शर्त है। दूसरी शर्त उपभोक्ता की जाग्रति है। दोनो ही स्तर पर अनदेखी है। केन्द्र और राज्य सरकार की लाईसेंस ऑथिरिटी और उपभोक्ता की इस सुषुप्तता का फायदा बाज़ार उठा रहा है। जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर बेहिसाब मुनाफा कमा रहा है। नेस्ले के बेबी फूड में ज्यादा चीनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जरूर अलख जगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने एफएमसीजी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। नेस्ले के बेबी फूड में अतिरिक्त चीनी के मामले ने सब की आखें भी खोल दी हैं। यह तो एक प्रकरण है। जांच करें तो भारत जैसे देश में ऐसे लाखों मामले पकड़े जा सकते हैं। सरकार की नीतियों में कमी के चलते यह हालात बनें हुए हैं। राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार को जन स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कड़ी नीति बनाने तथा इसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट से ही उम्मीद है कि जनता के स्वास्थ्य की चिन्ता करते हुए कोई ठोस रास्ता निकलें। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को महंगी दवाएं और उपचार करने का जिक्र करते हुए कहा है कि पतंजलि पर अंगुली उठाते समय चार अंगुलियां आप ( स्वयं) की तरफ जाती है। भ्रामक विज्ञापनों का मुद्दा पतंजलि तक सीमित नहीं है, यह भी एफएमबी जैसी कंपनियों के लिए भी है। दरअसल देश में खाद्य सामग्री में मिलावट एक गंभीर मुद्दा है जो सीधे रूप मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जब खाद्य प्रसंस्करण की सामग्री; चाहे मिठाइयां हों या नमकीन, पेय पदार्थ हों या फास्ट फूड। सबमें मिलावट की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। जब नेस्ले जैसी कंपनी बेबी फूड में ज्यादा चीनी मिला सकती है तो आम तौर पर खाद्य प्रसंस्करण करने वालों पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है? अब सुप्रीम कोर्ट ने अलख जगाई है तो समाधान की कुछ उम्मीदें बंधी हैं। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण सेरेलेक बेबी सीरियल के देशभर में नमूने इकट्ठे कर रही है। स्विस एनजीओ पब्लिक आई की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी इस उत्पाद में अत्यधिक चीनी मिला रही है। इस बात पर उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय , राष्ट्रीय बाल आयोग ने चिंता जताई है। इस चिंता के कुछ तो मायने होंगे ही। सरकारी एजेंसियों के स्तर पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। अमानक खाद्य सामग्री, नकली दवाएं और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को सरकार की नीति में लाएं। इन्हें मनमानी की छूट क्यों दी जा रही है ? उपभोक्ता के स्वास्थ्य की सुरक्षा और हितों की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है।

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