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विमर्श : मानव प्रबोधन प्रन्यास, शिवबाड़ी मठ को यूनिवर्सिटी की मानिद मान्यता मिले

मानव प्रबोधन प्रन्यास ने पिछले तीन दशकों से गीता ज्ञान परीक्षा आयोजित कर रहा है। इस परीक्षा के माध्यम से अब तक 15 लाख परीक्षार्थी संस्कारित हो चुके हैं। गीता श्लोक स्मरण, गीता निबन्ध प्रतियोगिताएं, गीता भाषण प्रतियोगिताए में लाखों विद्यार्थियों की भागीदारी रही है। हर वर्ष गीता पुरस्कार वितरण समारोह होता है। 5 लाख से अधिक श्रीमद्भगवद् गीता का वितरण हुआ है। यह कार्य किसी विश्विवद्यालय की ओर से किसी विशिष्ट विषय में दिए जाने वाले ज्ञान से कम नहीं है।

इन गीता ग्रन्थ की गतिविधियों का क्या महत्व है? यह इससे समझा जा सकता है कि गीता ज्ञाननिधि में एक महामूल्य चिंतामणी रत्न है। साहित्य सागर में अमृत कुंभ है। विचारों के उद्यान में कल्पतरू है। सत्य पथ के प्रदर्शित करने के लिए संसार भर में गीता एक अद्वितीय और अद्भुत ज्योति स्तंभ है। गीता में सांख्य, पातजल और वेदांत का समन्वय है। इसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति की अपूर्व एकता है। आशीर्वाद का निराला निरूपण है। कर्तव्य कर्म का उच्चतर प्रोत्साहन है। भक्ति भाव सर्वोत्तम प्रकार से वर्णन है। गीता आत्म ज्ञान की गंगा है।

प्रन्यास ने इसके अलावा भी शिक्षा के ऐसे कई विशिष्ट कार्य किए हैं, जो आम तौर पर सरकार विश्वविद्यालय नहीं कर पा रहे हैं। लोकचित को परिष्कृत करने के लिए संवित् साहित्य शिर्वाचन प्रकाशन से पुस्तकों की पूरी श्रृंखला प्रकाशित की है। जिसमें आध्यात्मिक ज्ञान को नई पीढ़ी में नए संदर्भों से सुलभ करवा है। राठी गाय की कम होती नस्ल को संरक्षित करने की पहल की गई। राठी नस्ल की गायों के पोषण एवं संर्वधन के लिए सुरभि गौशाला पूरी व्यवस्था के लिए गायों की स्थानीय नस्लों के संरक्षण का संदेश रहा है। संवित् शूटिग संस्थान से पिछले ढाई दशक से निशानेबाजी की कला का प्रशिक्षण चल रहा है। इसका इंपैक्ट निशानेबाजी में राष्ट्रीय और अतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जा सकता है। यह काम संवित् धनुर्वेद संस्थान की ओर से एक दशक से धनुर्विद्या से आत्म प्रशिक्षण के रूप में किया जा रहा है। संवित् तरुणायन तरुणों को भारतीय संस्कृति से रू-ब-रू करवाने की दिशा में किए जा रहे कार्य की महत्ता को कोई भी चिन्तक, शिक्षाविद् समझ सकता है। बाकयदा वनस्पति वैज्ञानिक संवित् उद्यान में वनस्पतियों को उन्नत करना एवं पर्यावरण संरक्षण के काम में लगे हुए हैं। संवित् उद्यान किसी भी विश्वविद्यालय में वनस्पति विकास का मॉडल माना जा सकता है। अधिष्ठाता स्वामी विमर्शानंद जी इन गतिविधियों को आगे बढ़ा रहे हैं। भारत सरकार को इन विषयों के साथ बीकानेर की उस्ता कला, मांड गायकी, मथेरण कला, कपडों पर छपाई कला, काष्ठ कला, खाद्य प्रसंस्करण, ऊन से गलीचा बनाने की कला, लोक गायकी, लोक नृत्य समेत परम्परागत कार्य और विरासत के ज्ञान के विषयों को शामिल कर प्रन्यास को मानद विश्वविद्यालय के समकक्ष मान्यता देनी चाहिए।

केन्द्र की सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मानव प्रबोधन प्रन्यास की शैक्षिणिक कार्यों के एक माडल के रूप में माना जा सकता है। देश में विश्वविद्यालयों की संख्या में बढ़ती जा रही है। विशिष्ट विषयों कृषि, इंजीनियरिंग, संस्कृत, संगीत, पत्रकारिता, खेल, लोक कला जैसे विषयों के अध्ययन को महत्व देने के खातिर वि. वि. खोले गए हैं। ऐसे में मानव प्रबोधन प्रन्यास को भी इसी श्रेणी में मानकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इसे मानद संस्थान घोषित करें। बीकानेर में स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्व विद्यालय, राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान वि. वि., तकनीकी और महाराज गंगासिंह वि. वि की तर्ज पर इतने सारे विषयों पर पिछले तीन दशकों से हुए कामों को और आगे बढ़ाने के हमारे केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और राजस्थान सरकार के मंत्री सुमित गोदारा इस प्रन्यास के महत्व का आकलन कर इसे गति देने का दायित्व निभाए। प्रन्यास को मानद वि. वि. की श्रेणी में सरकार को खुद विश्लेषण कर मान्यता देने की पहल करनी चाहिए। देशभर में इस तरह से काम करने वाले संस्थान को इस श्रेणी में लाने से शिक्षा का दायरा और बढ़ सकेगा।

खैरगढ़ (मध्यप्रदेश) इंद्रा कला और संगीत विश्वविद्यालय हैं। केवल महिलाओं के लिए मुंबई में थैकरसी विश्वविद्यालय हैं। इनके अतिरिक्त कुछ शिक्षण संस्थाओं को उनके विशिष्ट महत्व के कारण विश्वविद्यालय के समक्ष माना गया है। गुजरात विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, जामेमिलीया देहली, गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार, ने स्वाधीनताप्राप्ति के पूर्व राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान भूमिका निभाने पर विश्वविद्यालय के समकक्ष मान्यता दी गई। विज्ञान तकनीकी एवं समाज विज्ञान के शिक्षानुसंधान की विशिष्टताओं के कारण बिड़ला तकनीकी एवं विज्ञान संस्थान पिलानी, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलौर, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान देहली, टाटा समाजविज्ञान संस्थान मुंबई तथा भारतीय अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान देहली को भी विश्वविद्यालय के समकक्ष माना गया है।

औपनिवेशिक भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना शासक वर्ग के हितों की सेवा के लिए की गई थी। अब आजादी के 70 वर्ष बाद अमृत वर्ष में इस मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विश्वविद्यालयों को अकादमिक पाठ्यक्रम और शोध को ‘राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप’ बनाने के दिशा-निर्देश हैं। विश्वविद्यालय को समझने के लिए अरस्तू के ज्ञान मीमांसा, तकनीक और फ्रोनेसिस के सिद्धांत का उपयोग करते हैं और तर्क देते हैं कि विश्वविद्यालय का विचार “ज्ञानमीमांसा की खोज पर आधारित था।” बीकानेर के जनप्रतिनिधि और बीकानेर से केन्द्र और राज्य के मंत्री मानव प्रबोधन प्रन्यास की उपलब्धियों और कार्यों को जानते तो हैं उनकी सोच इन्हें आगे बढ़ाने में सहयोगी हो। इतनी सारी सकारात्मक गतिविधियों को और व्यापकता देकर बीकानेर को विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ाया जा सकता है। यह सब हमारे नेताओं की ओर से पहल पर संभव हो सकता है।

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