विमर्श : खेजड़ी मुद्दे पर महा आन्दोलन की घोषणा को अनसुना क्यों कर रही है सरकार?

मुकाम में खेजड़ी कटाई के विरूध्द महापंचायत में निर्णय किया गया है कि 2 फरवरी 2026 से बीकानेर में महापड़ाव किया जाएगा। मुकाम पीठाधीश्वर स्वामी रामानंद महाराज ने संत समाज और पर्यावरण प्रेमियों की महापंचायत में खेजड़ी की कटाई को गंभीर माना है। गोचर मुद्दे पर आर पार की लड़ाई के लिए सरकार को 28 दिनों का अल्टीमेटम दिया गया है। 27 जनवरी 2026 से महामंडलेश्वर सरजूदास महाराज ने बीकानेर में संतों के बड़े आन्दोलन की घोषणा की है। इधर अरावली मुद्दे पर केन्द्र सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए 20 नवम्बर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। इस मुद्दे पर जन विरोध का केन्द्र सरकार ने तुरन्त संज्ञान लेकर अरावली में खनन के नए पट्टे जारी करने पर रोक लगा दी। साथ ही संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने का निर्णय भी दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी संवेदनशीलता दिखाई खुद की दी परिभाषा पर स्वतः संज्ञान लिया और फिर से सुनवाई कर रही है। राजस्थान सरकार की संवेदनशीलता कहां गई ? राजस्थान सरकार खेजड़ी और गोचर के मुद्दे पर जन भावना को क्यों अनसुना कर रही है ? मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा संवेदनशील नेता है। यह चूक किस स्तर पर हो रही है, जो राजस्थान सरकार और भाजपा को आलोचना और जन विरोध का कारण बनती जा रही है। उचित अनुचित पर निर्णय हो। मुद्दे को सरकार अनदेखा नहीं करें।
बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान में मरूस्थलीय पेड़ खेजड़ी को काटकर सौर ऊर्जा से विद्युत उत्पादन और गोचर, ओरण, जोहड़ पायतन को मिटाकर विकास के भावी परिणाम का आकलन कोई भी सहज रूप से कर सकता है। मरुस्थलीय पारिस्थितिकी का अपना एक सतत् प्रकृति प्रवाह है। क्या विकास की थोपी गई योजनाओं के दूरगामी परिणामों का आकलन कर लिया गया है ? मरूस्थल केवल सौर किरणों के अधिकतम ठहराव की भूमि नहीं है। मरूस्थल का अपना जीवन है। टिब्बों वाली यह जमीन हजारों तरह की वनस्पति , सरीसृप, वन्य जीव जन्तु, पक्षी, कीट पतंगों को समाए हुए हैं। जैव विविधता का स्थानीय पारिस्थितिकी में कितना मूल्य है इसकी योजनाकारों को कोई परवाह नहीं है। गोचर, ओरण, आगोर, तालाब, नाड़ी, जोहड़ पायतान योजनाकारों को केवल जमीन दिखाई देती है। इसके पीछे के प्राकृतिक तंत्र को नहीं समझा जा रहा है। सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट इस जीवन संस्कृति को नष्ट करती जा रही है। लाखो सरीसृप पिछले 14 वर्षों में नष्ट हो गए हैं। वनस्पति, जीव जन्तुओं और पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने से पड़ने वाले प्रभावों का कोई आकलन करने वाला नहीं है। विकास के दूसरे पहलू कोई देखने वाला नहीं है। क्या नष्ट होने के बाद जैवविविधता को फिर लौटाया जा सकेगा?
पेड़ काटने से होने वाले पारिस्थिकीय और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के आकलन पर विषय विशेषज्ञ पूरी किताब लिख सकते है। पेड़ काटने से मिट्टी का क्षरण, जलवायु असंतुलन, वर्षा पानी का बहाव, कार्बन डाइ आक्साइड में बढ़ोतरी, पशुधन संरक्षण और संर्वधन पर प्रतिकूल असर, मानव और अन्य जीव जगत पर प्रतिकूल असर ये तो सामान्य दुष्प्रभाव है जो आमतौर पर लोग समझ सकते है। सूक्ष्म और दीर्घकालीन प्रभावों का असर तो वर्षों बाद सामने आता है। थोपा गया विकास अंततः विनाश ही लेकर आता है। यह प्रकृति और पर्यावरण को ही नष्ट नहीं करता , बल्कि मानवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन को भी नष्ट भ्रष्ट कर देता है। कोई भी यह जान सकता है कि पेड़ कटे, गोचर उजड़े, पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो तो परिणाम क्या होगा?
इस पर हमारे नेता – जनप्रतिनिधि या तो दबी जुबान बोलते हैं या चुप है। साधु समाज और नागरिक मुखर होकर विरोध कर रहे हैं। इनकी आवाज इतनी बुलंद है कि अंतोतगत्वा तो सरकार को खेजड़ी की कटाई रोकने और गोचर, ओरण, आगोर को संरक्षित करना ही पड़ेगा, क्योंकि आम आदमी और साधु समाज निरपेक्ष रूप से जानते है कि गोचर ओरण, आगोर और खेजड़ी का महत्व क्या है। सत्ता, अफसर और नेताओं में यह निपेक्षता नहीं है। इन पर स्वार्थ है या थोपा गया दबाव है। तभी तो कई नेता जनता की जुबान बोलकर भूमिगत हो गए हैं। अब कमान जनता और साधु समाज के हाथ में है जहां न राजनीति का दबाव है और न कोई स्वार्थ और प्रलोभ। शुध्द प्रकृति के प्रति जनास्था, गाय गोचर और खेजड़ी के प्रति उऋणता का भाव। मर मिटने का संकल्प। साधु संतों के आन्दोलन और जनभावना के विपरीत क्या यह सरकार गोचर के अन्य उपयोग और खेजड़ी की अवैध कटाई के जिद पर टिक सकेगी?

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