मेरी बात : मनोज रूपड़ा प्रकरण- ये ‘चुप्पियां’ एक दिन सबको खा जाएंगी

–सुमित शर्मा
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी ‘बिलासपुर’ में कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ जो ‘अन्याय’ हुआ, उस पर सब ‘न्याय’ की मांग कर रहे हैं। यहां गुरु घासीदास विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी के तत्वाधान में आयोजित एक समारोह कई दिनों से सुर्खियों में है। इस आयोजन का विषय था- ‘समकालीन हिन्दी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ’। जिसमें देश के नामचीन कहानीकार आमंत्रित थे, उन्हीं में एक नाम था- मनोज रूपड़ा। कार्यक्रम के दौरान, विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक चक्रवाल कविता पर मज़ाक करते हुए वक्तव्य दे रहे थे। बोलते-बोलते अचानक उनकी नज़र मनोज रूपड़ा पर पड़ी और वे उनसे पूछ बैठे- “कहीं आप मेरी बातों से बोर तो नहीं हो रहे?”
स्पष्टवादी मनोज रूपड़ा के मन में जो बात थी, वो होठों पर ला दी, बोले- “आप विषय पर बोलें तो अच्छा है।”
यह जवाब सुनकर कुलपति चक्रवाल के भीतर चक्रवात उठ गया। ईगो इस कदर हर्ट हुआ कि आपा खो बैठे। ग़ुस्से से भरकर बोले- “इनको यहां किसने बुलाया है? इस आदमी को दुबारा न बुलाया जाए। आप जाइये यहां से, यहां आपका कोई सम्मान नहीं है..।”
विद्या के मंदिर में सम्मानित की बजाय ‘अपमानित’ होकर ‘अतिथि रूपड़ा’ वहां से बाहर चले आए। भीतर बैठा रहा- कुलपति का दंभ और कुछ चुप्पीधारी देश के ‘दिग्गज’ साहित्यकार। चक्रवाल बोलते रहे, साहित्यकार चुप्पी साधे सुनते रहे। कुलपति के क्रोध से खौफ़ज़दा किन्हीं कॉलेजी छात्रों के मानिंद..

वैसे, इस तनावभरे माहौल के बीच आपको बता दूं कि मनोज रूपड़ा देश के जाने-माने कहानीकार हैं। जिनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं- ‘दफ़न और अन्य कहानियाँ’, ‘साज़-नासाज़’, ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’, ‘आमाज़गाह’, ‘अनुभूति’, ‘दहन’ (कहानी-संग्रह); ‘प्रतिसंसार’, ‘काले अध्याय’ (उपन्यास); ‘कला का आस्वाद’ (वैचारिक निबन्ध) इत्यादि।
..तो इन्हीं जाने-माने रूपड़ा के तिरस्कार का वीडियो जब वायरल हुआ, तो उसे देखकर हर कोई व्यथित हो गया। फिर तो लानतों का वो दौर शुरु हुआ कि पूछिए मत। कुलपति और उन तमाशबीन साहित्यकारों को देशभर से बोरे भर-भरकर लानतें दी गईं। एक ने केदारनाथ सिंह की कविता से विरोध दर्ज करवाया, कहा कि-
चुप्पियाँ बढ़ती जा रही हैं
उन सारी जगहों पर
जहाँ बोलना ज़रूरी था।
जैसे बढ़ते बाल
जैसे बढ़ते हैं नाख़ून
और आश्चर्य कि किसी को वह
गड़ता तक नहीं।
यह भी कहा कि “इस वाकये के लिये वीसी और उनका आचरण तो जिम्मेदार है ही। वे साहित्यकार भी जिम्मेदार हैं, जो मनोज रूपड़ा के अपमान के दौरान चुप बैठे रहे। आख़िर किस डर से वे वहीं बैठे रहे? उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया?”
किसी ने कहा कि- “विश्वविद्यालय वह जगह होती है, जहाँ विचारों को पंख लगते हैं और प्रश्नों को सम्मान। वहीं, यदि सत्ता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति लेखन और लेखक से बदतमीज़ी पर उतर आए, तो यह दृश्य इतना ही पीड़ादायक और शर्मनाक हो जाता है।”
एक जन ने तो लाख टके की बात कहकर दिल जीत लिया कि “ग़लत का विरोध अब नियम नहीं, अपवाद मात्र बन चुका है। हर किसी में विरोध करने की हिम्मत कहां होती है?”
कई ने तो सवाल भी पूछे कि “भाषा का सम्मानित लेखक अपमानित हुआ है, तिस पर लेखकों का स्वाभाविक आक्रोश इतनी समझदार चुप्पी में कैसे बदल गया ? साहस की कमी से सिर्फ शब्द नहीं मरते, समूह भी मरता है।“
एक ने तो यह आरोप भी मढ़ दिया कि “आयोजन साहित्य अकादमी का था लेकिन उस पर कुछ न बोलकर भविष्य के आमंत्रण और लिफ़ाफ़े बचाये जा रहे हैं। मैं जानता हूं, कोई भी साहित्यकार साहित्य अकादमी से माफी मांगने को नहीं कहेगा। लोभ और आस बहुत बड़ी चीज होती है”
इस तरह कोई बोला तो किसी ने सवाल उठाये। बोलना चाहिये भी क्योंकि बोलने का मतलब यह नहीं है कि आपके बोलनेभर से राजधानी पलट जाएगी। बोलने का मतलब है कि आप इंसान हैं, सही-ग़लत का फर्क समझते हैं। इसलिये बोलकर सही का समर्थन कीजिये, ग़लत पर आवाज़ उठाइये। मशाल थामिये। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता यही तो कहती है-
भेड़िया गुर्राता है
तुम मशाल जलाओ।
उसमें और तुममें
यही बुनियादी फ़र्क है कि
भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।
अब तुम मशाल उठाओ
भेड़िए के करीब जाओ
भेड़िया भागेगा।
करोड़ों हाथों में मशाल लेकर
एक-एक झाड़ी की ओर बढ़ो
सब भेड़िए भागेंगे।
हमने भी बोला। विरोध की बात हमारे शहर-बीकानेर के साहित्यकारों तक (सब नहीं, कुछ) पूगतां की। व्हाट्स एप पर भी संदेशा किया मगर कोई जवाब न आया। जवाब आया फकत- साहित्यकार प्रमोद कुमार शर्मा का। जिन्होंने नाराज़ होकर फेसबुक पर लिखा कि- “मनोज रूपड़ा और कुलपति छत्तीसगढ़ आलोक कुमार चक्रवाल के बीच का विवाद बीकानेर में भी दस्तक दे चुका है।..पर इस पर कान धरने की हिमाकत कोई नहीं कर रहा। कुलपति के पास राज्यमंत्री का दर्जा होता है। फासिस्ट माइंड के लेखक ये ख़तरा मोल ले भी नहीं सकते। उन्हें डर लगता है। कल को कोई पुरस्कार-सुस्कार से नाम कट गया तो कहीं के भी नहीं रहेंगे। अब तक बीकानेर से एक भी लेखक ने प्रतिवाद नहीं किया।” (यहां क्लिक कर पढ़ें)
प्रमोद शर्मा को शिकायत थी कि “ये फकत रूपड़ा का तिरस्कार नहीं था बल्कि पूरी लेखक बिरादरी का तिरस्कार था। बावजूद इसके, बीकानेर के सैंकड़ों साहित्यकारों में से किसी को अपनी बिरादरी के बंदे की बेइज्जती पर तकलीफ न हुई?.. और गर हुई तो विरोध दर्ज क्यों नहीं करवाया? सार्वजनिक या सोशल मीडिया पर भी..। सर्दी के मौसम में सब चुप्पियों की चादर ओढ़े रहे। कोई बात नहीं। हम दूसरी मशाल जलाएंगे।”
इसके बाद प्रमोद शर्मा ने कई साहित्यकारों को मैसेज किये कि “वे एक नुक्कड़ विचार गोष्ठी के माध्यम से बीकानेर की तरफ से विरोध दर्ज करवाना चाहते हैं। आप साहित्यकारों के ठिकाने कहे जाने वाले ‘नागरी भंडार’ के सामने पहुंचें। ..ताकि इस प्रकरण पर सामूहिक विरोध दर्ज करवा सकें।”
प्रमोद शर्मा तय समय पर वहां मौजूद मिले। हाथ में डमरू और जुबां पर यही अल्फाज कि कोई आए या न आए, हम इस नुक्कड़ विचार गोष्ठी से अपनी बात सब तक पहुंचाएंगे। थोड़ी देर इंतेज़ार हुआ। सैंकड़ों साहित्यकारों वाले शहर से कुल 3 लोग ही इकट्ठा हुये। प्रमोद शर्मा, कासिम बीकानेरी और मैं सुमित शर्मा। संख्या तीन की थी लेकिन संदेश तल्ख था। बेपरवाह होकर प्रमोद शर्मा ने डमरू बजाया। डम..डम..डम..। बोले- “गांधी को भी तो ट्रेन से उतार दिया था। उसी तरह यह भी सांकेतिक विरोध है। हम चाहते हैं कि बीकानेर के हिस्से के विरोध की आवाज़ बिलासपुर पहुंचे।”
कासिम बीकानेरी बोले- “कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ जो व्यवहार हुआ, उसका हम तहेदिल से विरोध करते हैं।
सुमित शर्मा बोले- “मुझे बीकानेर से शिकायत रहती है कि अक्सर यहां ग़लत बात पर लोगों की चुप्पियां नहीं टूटतीं। (पहले भी कई मौकों पर न टूटी थी) अजी ! नफे-नुकसान, डर से डरना छोड़िये। ग़लत बातों का विरोध कीजिये।“
कुल 20-25 मिनटों तक हमने मन की बात जनता के नाम की। जैसे ही हमारी बात मुकम्मल हुई, वहां खड़ी एक लड़की ने तालियां बजाकर हौसलाअफजाई की। इस पूरी कवायद का इतनाभर हासिल था। “चलो, कोई तो चेता।” यही सोचकर हम ख़ुश हो लिये। ख़ुश इसलिये भी बीकानेर के हिस्से का विरोध दर्ज हो चुका। ख़ुश इसलिये भी कि प्रमोद शर्मा ने मेरे और कासिम बीकानेरी के नाम एक तोहफा किया। आइये न ! मिलकर बांट लेते हैं। (यहां क्लिक कर सुनें)
रौशनी के लिये बिजलियों से लड़ा,
खुशबुओं के लिये तितलियों से लड़ा,
आप क्या रूठकर मुझसे दूर गये,
ताउम्र अपनी मैं ग़लतियों से लड़ा।
..कि भूख थी जब मेरा थी नसीब दोस्तों,
पेट क्यों रातभर पसलियों से लड़ा।
ओ ! पढ़के तेरा गुलाबी सा ख़त आख़िरी
एक आंसू मेरा हिचकियों से लड़ा।
दूसरों की लड़ाई लड़ने की बात पर हम दोनों श्रोताओं के जुबान पर “ज़िंदाबाद” के नारे चस्पा थे। चाय भी पी जा चुकी थी। इसके बाद, हम अपने-अपने रास्ते निकल पड़े। ..लेकिन आप यहीं रुकिये । अरुण कमल की कविता ‘थूक’ सुनते जाइये, जिसमें उन्होंने कहा था कि-
“जब वह गुंडा प्राचार्य मान बहादुर सिंह को
उनके कक्ष से खींच घसीटे जा रहा था
तब हज़ारों विद्यार्थी जमा थे चारों तरफ़
और वह गुंडा अकेला था और मानबहादुर अकेले
कॉमरेड सुधीर ने घटना बताते हुए कहा था
अगर सब लोग थूक देते एक साथ
तो गुंडा वहीं डूब जाता
यही तो कहते रहे कवि मान बहादुर जीवन भर
पर कितना कम थूक है अब इस देश के कंठ में।”
इस कम बचे थूक से चुप्पियां मत निगलिये।..और हां, ये कड़वी बात पढ़कर किसी पर खीज न निकालें, बल्कि ग़लत के विरोध का साहस जुटाएं। चुप्पियां तोड़िये, नहीं तो एक दिन ये हम सबको खा जाएंगी। ..और मनोज रुपडा के साथ जो हुआ, वह आगे भी होता जाएगा।
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